बोर्ड एग्जाम

कुछ दिन पहले चल रहे बारहवीं के बोर्ड एग्जाम के एक सेंटर पर जाना हुआ तो 3 साल पहले बीते अपने एग्जाम की याद बरबस ही दिमाग में आ गयी। वो घबराहट भरा एग्जाम डेट का काउंटडाउन, एग्जामिनेशन हॉल की तरफ बढ़ते क़दमों के साथ दिल की धड़कनों बढ़ना और परीक्षा शुरू होने से पहले दिमाग का एकदम ब्लैंक हो जाना, ये सब कल की ही बात लगने लगी। मगर मेरे साथ कुछ और भी हुआ था उस वक़्त, कुछ ऐसा जिसकी याद के सामने ये सब यादें फीकी थी। ये याद भले न रहा है कि कौन सा पेपर कैसा गया था मगर उसके साथ एग्जामिनेशन हॉल में बिताया हर पल एक बड़ी गहरी छाप छोड़ गया। ग्यारहवीं और बारहवीं के दो साल हमनें उसकी नज़र में आने के लिए अपनी हैसियत के हिसाब से बहुत कुछ किया ये अलग बात है कि उस से सामने से जा कर बात करना हमारी हैसियत में नहीं था, हम तो बस फेसबुक पर उसकी तस्वीरों से ही बतिया सके। पता नहीं ये हमारी प्रार्थनाओं का फल था या किस्मत का एक खूबसूरत मोड़ कि उसकी सीट ठीक हमारे बगल में पड़ गयी। अब तो ये आलम था कि एग्जाम के पहले की लास्ट-मिनट रिवीजन छोड़ हम अपलक उसको ताके जा रहे थे। ये जादू तब टूटा जब एग्जामिनर ने हमारे सामने क्वेश्चन पेपर के भेष में मुसीबतों का पहाड़ ला पटका। पिताजी की मार का भय याद आते ही दिल पर पत्थर रख अपना ध्यान वहाँ से हटा कर सामने पड़ी मुसीबत पर लगाया। आखिरी आधे घंटे में में राहत की बात ये हुई कि हमारी दोनों invigilator आखिरी की बेंच के तरफ जा के बातों में लग गयी जिसका फायदा होनहारों ने जी खोल के उठाया। तभी वो मीठी आवाज़, जिसे रोज़ असेंबली में सुना करते थे , ने मेरा नाम पुकारा। शुरू में तो इसे दिवास्वप्न समझ के नज़रअंदाज़ किया मगर जब फिर से अपना नाम उस स्वर कोकिला के मुंह से सुना तो दिल की धड़कने यूँ तेज़ हुई कि लगा पूरी ज़िन्दगी का खून दिल एक ही दिन में पंप करने की फ़िराक़ में है। वो जिसे हमने अपनी एकलौती ज़रूरत समझा था उसको एक दो मार्क्स के क्वेश्चन के लिए मेरी ज़रूरत आन पड़ी थी। उस वक़्त हमें अपनी पढाई सार्थक लगने लगी। हम अपना लिखना बंद कर के अपनी कॉपी समेत उसके नज़दीक वाले छोर पर सरक गए। हमारे दूसरे बगल बैठे ज़ेरॉक्स मशीन चलाते दोस्त ने हमें कोई भद्दी गाली ज़रूर दी होगी मगर अब हमें फ़र्क़ कहाँ पड़ता था, अब तो हमें खुद के पास फेल या एक्सपेल होने की भी फ़िक्र नहीं थी। तो आखिरी घंटी बजते बजते यूँ हुआ कि हम उसके चार मार्क्स बढ़वाने के चक्कर में अपने छः मार्क्स की बलि चढ़ा आये। मगर फिर भी चेहरे पर एक संतोष वाली मुस्कान थी। और फिर उसने गज़ब ही किया, कॉपी जमा करने के बाद उसने सीधे हमारी आँखों में देखा और जानलेवा मुस्कान दी। कसम से बता रहे हैं, उसके गुलाबी होंठो पे बना वो curve दुनिया का सबसे हसीन parabola था। मुस्कान से आगे बढ़ के बातें हुयी जो क्वेश्चन के एनालिसिस से शुरू हो के उसके टिफिन के खाने तक पहुँच गयी। तब से तो एग्जाम के बीच के गैप में बातें ज़्यादा और पढाई कम होती थी। उपरवाला भला करे उसका जिसने एक महीने लंबा schedule बनाया। तो हुआ यूँ कि बातें शुरू हुई तो बढ़ती गयी और हमें एक चीज़ पता चली अपने बारे में कि बातों के मामले में हम भी कम चार्मिंग नहीं। एग्जाम खत्म हुआ तो अब रिजल्ट की चिंता बिलकुल नहीं थी, टॉप तो हम कर चुके।

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