सचिन

छोटा कद, हाथ में भारी बल्ला और चेहरे पर हर बार की तरह वही दृढ़ता लिए जब ये पवेलियन की सीढ़ियों से उतरते थे तब हर क्रिकेट प्रेमी की आँखों में चमक और मन में उत्साह हिलोरे मारने लगता था। सचिन के बारे में ऐसा कुछ कहना, जो पहले नहीं कहा जा चुका हो, नामुमकिन ही है।
नब्बे के दशक में पैदा होने का सबसे बड़ा ख़ामियाजा ये रहा कि हम तेंदुलकर को इंसान से भगवान बनते नहीं देख पाये, जब तक होश संभाला तब तक वो उस ऊंचाई पर पहुँच चुके थे। सचिन सचिन का शोर और तारीफ़ तो हर तरफ से सुनते थे मगर इस दीवानगी का हिस्सा बनने का सौभाग्य 2003 के वर्ल्ड कप में हासिल हुआ। वो पहली बार था जब हमने क्रिकेट टकटकी बाँध के देखी थी। तब जा के सचिन के सचिन होने की वजह समझ आयी। तब अख़बारों और पुरानी क्रिकेट मैग्जीन्स में उनकी इनिंग का लेखा जोखा पढ़ के जो रोमांच महसूस होता था वो किसी भी कॉमिक्स को पढ़ने से बेहतर था। वो सही मायनों में सुपरहीरो बन गए थे हमारे लिए। शेन वार्न हो या अख्तर या स्टेन, गेंदबाजों के नाम बदले हैसियत बदली मगर इस ने कभी उनमे भेद नहीं जाना। सचिन की बल्ले की जादूगरी को बयान करने वाले आपको कई काबिल लोग मिल जायेंगे, हम उनमे से एक नहीं। हमारे लिए तो सचिन एक अजूबा हैं। किसी और क्रिकेटर की खामियों खूबियों को analyze करने की कोशिश कर सकते हैं मगर जब बात सचिन की हो तो हमारे अंदर का वही बच्चा हावी हो जाता है जिसे क्रिकेट बारे में ज़्यादा पता नहीं था मगर सचिन को टकटकी बाँध देखता था।
शुक्रिया सचिन।

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