सन्नाटों का शोर

गौर से सुनना कभी
इन गहरे सन्नाटों का शोर
वो चीखें जो तुम तक पहुँचने से पहले
दम तोड़ चुकी थी
उसकी आखिरी हिचकी बस
कानों तक आयी थी
कभी गौर करना वो अकेली नहीं थी
साथ उसके कई और आवाज़े थी
लगेगा की शहर की कब्रें खुद गयी है
और बीते कल की काली स्याह परछाइयाँ
अपना आज ढूंढने निकली है
बीता हुआ पल सवाल पूछता है
जिनके जवाब नहीं कोई
शायद इसीलिए इन सन्नाटों को
सुन के अनसुना करते हैं
मगर सुनना कभी
कि ये ख़ामोशी क्या कहती है

 

Disclaimer: The featured image is taken from the internet and is believed to be open domain.

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