चुम्मा की विकास यात्रा

किस्स, चुम्मा, चुम्बन, बोसा..ऐसे अनेक नाम से ये हरकत जानी जाती है। अगर इसको परिभाषा में बांधने जाएँ तो कह सकते हैं कि यह दो जनों के बीच होने वाली वह दैहिक क्रिया है जिससे प्रेम और वासना दोनों का पुरजोर प्रदर्शन किया जाता रहा है। यहाँ हम U सर्टिफिकेट वाले गालों पर के किस की नहीं बल्कि उच्छवास और लार के आदान प्रदान वाली माउथ टू माउथ प्रक्रिया की बात कर रहे हैं। अतः 12 साल से कम उम्र के बच्चे इसे अपने माता पिता के देखरेख में पढ़े। डिस्क्लेमर के बाद वापस मुद्दे पर आते हैं। जब बातकिस्स की आती है तो फ्रांस वाले फ्रेंच किस्स का नाम ले के खुद को किस्स के मामले का फन्ने खां बताने की कोशिश करते हैं लेकिन असलियत तो ये है कि इस मामले में भी हमारा देश विश्वगुरु निकला। कामसूत्र में वात्स्यायन काका 30 तरह के चुम्मों की तकनीक बता चुके हैं तो ये बात कहना गलत नहीं होगा कि किस्स मेक आउट इन इंडिया का सबसे बड़ा उदाहरण है। मगर अफ़सोस की बात ये कि पुष्पक विमान और एटॉमिक हथियारों की तरह ही हम हिंदुस्तानी इस विरासत को संभाल के नहीं रख पाये फलस्वरूप ये कला हमें फिर से विदेशियों के जरिये सीखनी पड़ी। यही वजह रही की हम इस क्षेत्र में काफी पीछे रह गए। हालाँकि हम फिर से दुनिया में उभरती किसिंग सुपरपावर के तौर पर खुद को स्थापित कर पाये हैं और इसका अधिकतर श्रेय महान चुम्मा सम्राट इमरान हाशमी को जाता है। इस महान शख्स ने एक मर चुकी कला को माउथ टू माउथ दे के जीवंत करने का काम किया है। श्रीयुत हाशमी के आने से पहले हमारी फिल्मों में किस्स एक अनजानी कला बन चुकी थी। सिर्फ कुछ ऑफ-बीट फ़िल्मकार किसी तरह से इसे अंजाम दे पाते थे। मुख्य धारा की फिल्मों में किस्स अपने मौजूदा स्वरुप में पहुँचने से पहले कई रूपों से हो के गुज़रा। सबसे पहले आया दो फूलों का चुम्बन, मगर इसमें समस्या ये रही कि कई बार फूलों की आड़ में हीरो हीरोइन किस्स से ज़्यादा ही कर जाते थे जिसकी वजह से हीरोइन गर्भवती और उसका बाप बदनाम हो जाता था। इस समस्या से बचने के लिए फूलों से छुटकारा ले लिया गया और किस्स की जगह नर मादा अपनी ठुड्डियां मिलाने लगे। देखने में तो ये शर्मनाक लगता ही था, साथ ही साथ इस से गर्दन में होने वाले लचक की समस्या में भी बढ़ोत्तरी आई। उसके बाद किस्स को दिखाने के लिए हीरो के सर पर हीरोइन का हाथ उसके बालों का मर्दन करता दिखाया गया और उसके बाद हीरो अपने होंठों को पोछता दिखाया गया। ये बड़ा ही क्रिएटिव था लेकिन कितने ही लोगों में ये ग़लतफ़हमी आ गयी कि बालों को ऐसे नोचने से ही किस्स का मज़ा आता है और इसके साथ ही हीरो के बाल भी बड़ी तेज़ी से झड़ने लगे। चूँकि हम दूसरा अनुपम खेर नहीं चाहते थे इसलिए ये तरीका भी रोकना पड़ा। इसके बाद अवतरण हुआ चुमेश्वर बाबा हाशमी का और इसके बाद की कहानी तो जच्चा बच्चा दोनों जानते हैं। किस्स एक घरेलु वस्तु बन गयी..जहाँ सिनेमा वहाँ किस्स। घर घर में होंठों के रगड़ की आवाज़ें गूंजने लगी। सिनेमा में तो चुम्बन आम हो गए लेकिन आम जनजीवन में अभी भी हमारी इस विरासत को लोग अपना नहीं पाये हैं खुले दिल से। परंतु ये आशा है कि ये तस्वीर भी बदलेगी, तब तक के लिए  :-*

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