फ्रेंडशिप डे

ग्लोबलाइजेशन की वजह से जितनी भी चीज़ें हिंदुस्तान में आयी, उनमे से फलाना डे चिलाना वीक वाला सिस्टम सबसे सही लगता है हमको। इसी बहाने से एक एक दिन कर के दिल के अंदर के जज़्बातों को उमड़ उमड़ के निकलने का मौका तो मिलता है। साल का एक दिन तो अपने ज़िन्दगी के किसी खास हिस्से पर ध्यान देने का मौका मिलता है। ऐसे ऐसे दिनों का असली लुत्फ़ लड़कपन में उठाया जाता है। ज़िन्दगी का वो वक़्त जब इंसान को बेवकूफ़ी भरी बातें और हरकतें allowed होती है। हालाँकि कितने ही क्रन्तिकारी लोग अपने लड़कपन की बेवकूफ़ी तो ताउम्र सीने से लगाये रखते हैं। बहरहाल ये बात लड़कपन के बेवकूफ़ी भरे सालों में से एक साल के फ्रेंडशिप डे की है।

फ्रेंडशिप डे वैसे तो दोस्तों की यारी सेलिब्रेट करने के लिए होता है, मगर ये उन लड़कों के लिए दूसरा मौका भी होता है जिनको वैलेंटाइन्स डे पर कुछ कहने में डर लगता है। कहने को तो friendzone होने से डरते हैं लड़के मगर असल में हालात तो ये होते हैं कि कम से कम फ्रेंड ही बना ले। तस्वीर तो ये होती है कि अगर कोई लड़का किसी लड़की को फ्रेंड बनने का न्योता देता है इसदिन तो बेसिकली वो उस से आई लव यू ही बोल रहा होता है। ऐसे लड़को में हिम्मत की जो कमी होती है उसकी भरपाई वो optimism और सब्र से कर लेते हैं। ऐसे ही लड़को की बिरादरी से हम भी आते हैं।
एक तो ये खुन्नस रहती है इस दिन से कि ये होता रविवार को ही है। रविवार यानि वो दिन जब ली गयी एक एक साँस तक की ख़बर पिताश्री को होती थी। वैसी सख्त निगरानी में फ्रेंडशिप बैंड बांधने बाहर जाना खतरे से खाली नहीं था। ऐसे सूरत ए हाल में ट्यूशन वाले टीचर का एक्स्ट्रा क्लास लगवाना वरदान जैसा लगा था। लाइफ में पहली बार ऐसा लगा कि एक्स्ट्रा क्लास से कुछ भला हो रहा है। अब मौका तो मिल गया था लेकिन दिक्कत ये थी कि जिस से “दोस्ती” करने की चाहत दिल में थी उस से डर लगता था। ये डर ऐसे ही बेवजह नहीं था, बात ये था कि जिसके लिए दिल में जज़्बात थे उसका गुस्सा बड़ा पॉपुलर था। किदवंती थी कि पिछले वैलेंटाइन्स को हमारे एक साल सीनियर लड़के ने प्रपोजल के बदले उसके हाथ का थप्पड़ खाया था। तो जो आज करने जा रहे थे उसमें शेर के मुँह में हाथ डालने जैसा जोखिम था। खास इसी दिन के लिए मम्मी के पर्स से धीरे धीरे पैसे निकाल निकाल के जमा कर के एक मंहगा और सुन्दर सा फ्रेंडशिप बैंड ख़रीदा था।

जो ट्यूशन शुरू होने से पहले का खुशनुमा वक़्त होता है उसी में हम इस काम को अंजाम देने चल पड़े। तब हालात ऐसी थी कि दिल की धड़कन सुननी हो तो स्टेथोस्कोप की ज़रूरत भी ना पड़े। काश ज़िन्दगी उतनी अच्छी होती जितने हमारे daydreams में लगती थी। बीते हफ्ते में सैकड़ो बार इस पल की प्लानिंग की थी लेकिन अब हर बढ़ते कदम के साथ दिमाग रुकते जा रहा था। पीछे हमारे दोस्त हमारे पिटने की उम्मीद लगाये देख रहे थे और आगे उसके दोस्त हमारी तरफ मज़ाक उड़ाने वाली नज़रों से ताक रहे थे। तभी हमारे क़दमों को हमारी मंज़िल ने रोक दिया और सामने वो दिखी। उसको जो अपने सामने देखा तो दिल से सारा डर गायब हो गया। उस वक़्त तो ऐसा लगा कि उसका थप्पड़ भी इनायत होगी। उसके डुबाने वाले हुस्न से खुद को उबारा, बैंड उसकी तरफ बढ़ाया और अंग्रेज़ी में कह डाला, “will you be my friend?” ये कह कर खुद को थप्पड़ के लिए mentally prepare करने लगे। मगर तभी उसकी हथेली की जगह सामने से आती उसकी कलाई दिखी। लगने लगा की साला हम अभी भी imagine ही कर रहे हैं लेकिन जब उसने “बांधो!” कहा तो पहली बार हक़ीक़त सपनो से बेहतर लगी। उसके चेहरे की तरफ देखा तो वो मुस्कुरा के हमारी तरफ देख रही थी। कसम से उस वक़्त ऐसा लगा कि अगर अभी जान भी ले जाये कोई तो उस से कोई शिकवा नहीं होगा। हमारी उस वक़्त तक की ज़िन्दगी एक तरफ और वो दस सेकंड एक तरफ, फिर भी पाला उन दस सेकंड का ही भारी रहेगा। अपनी इस मदहोशी से उबार के उसकी नाज़ुक कलाई पर बैंड बाँधा तो वो बैंड और भी खूबसूरत हो चला था। हम इश्क़ का पहला पायदान चढ़ चुके थे, अब हम दोस्त हो गए थे।

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