ग़लतफ़हमी का इश्क़

कोलकाता, इस शहर को मैं प्यार का शहर मानता हूँ। अगर यहाँ रह के प्यार में ना पड़े तो मुमकिन है कि प्यार आपके बस का न हो। इसके पीछे की वजह ये कि ये शहर आपको बहुत से मौके देता है किसी को अपना बनाने के लिए और अपना बनाने के बाद आगे की क्रिया के लिए भी भरपूर गुंजाईश है यहाँ। जो सिंगल से डबल होना चाहते हैं उनके लिए बहती हुगली में हाथ धोने का अवसर इंतज़ार कर रहा होता है।
स्कूल के आखिरी के दो साल इसी शहर में गुज़ारे हैं मैंने। इन दो सालों में एक तो छोटे शहर के लम्पट होने से महानगर की चकाचौंध में घुलने में ही गुज़र गए। जब आँखें शहर की आदि हो गयी तो हमने भी यहाँ के नज़ारे हसरत भरी नज़रों से देखना शुरू किया। हर संभव दिशा में नज़रें दौड़ने के बाद एक मंज़िल दिखी। खुशकिस्मती ये थी कि वो मंज़िल पूरे वक़्त नज़रों के सामने ही मौजूद होती थी। भला हो स्कूल के आर्किटेक्ट का की जहाँ हम बैठते थे वहाँ से नाक की सीध में सामने वाले क्लास में वो बैठती थी। वक़्त बेवक़्त आँखों की लड़ाई हो जाती लेकिन मेरी ही आँखें हार मान कर भाग खड़ी होती थी। अब भले ही यहाँ मौकों की कमी नहीं हो लेकिन मौके का फायदा उठाने का भी हुनर चाहिए होता है और दुख की बात ये कि ये हुनर अभी भी कोसों दूर था। अंग्रेज़ी की एक कहावत है कि “Fortune favours the brave” मगर हम निहायती फट्टु निकले।
इसी ग़म में ज़िन्दगी कट रही थी कि एक वो दिन आया। वो दिन था वसंत पंचमी का और यहाँ ये दिन स्वदेशी वैलेंटाइन्स डे के जैसा ही होता है। इसी दिन उस पर मेरी नज़र और मुझ पर उसके हुस्न की बिजली पड़ी थी। हमेशा की तरह दिल में कामनाएं और अपनी चोर जैसी नज़रे लिए आँखों की कसरत कर रहे थे कि तभी उसका आना हुआ। गुलाबी साड़ी में लिपटी, काजल भरी आँखों से ज़ख्मी कर के अपने गुलाबी होठों की मुस्कान की मरहम लगाती वो चली आ रही थी। बावजूद इसके कि उसको देखना दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया था लेकिन उस वक़्त उसको देखना अपने ज़िन्दगी की सबसे बड़ी अचीवमेंट लग रही थी। जब वो पास से हो के, आँखों में से मेरी नीयत में झांकते हुए मुस्कुरा के गुज़री तो लगा जैसे मेरे सीने से दिल निकाल के अपने साथ ले जा रही हो। हुस्न के उसी नशे में डूबे हुए मैंने तय किया कि आज इनकार का जोखिम लेते हुए इज़हार कर देना है। इस से पहले कि मेरे अंदर का डरपोक मुझे अंजाम का डर दिखा के शांत करे मैं उसको सब बोल देने के लिए उसे ढूंढने लगा। ढूंढते हुए जब वो मिली तो जो देखा उस से दिल बैठा नहीं, लेट ही गया। हम यहाँ खयालों में पुलाव पका रहे थे, वहाँ कोई और बिरयानी में मुँह मार रहा था और वो भी मेरे ही क्लास में दो बेंच पीछे बैठने वाला लौंडा। सपनों के जितने पुल बांधे थे वो किसी घूसखोर इंजीनियर के सृजन के जैसे ढह गया और मलबे में हमारा दिल चूर चूर हो गया। ये तो बाद में पता चला कि जिसकी नज़रों को हम खुद की नज़रों से लड़ता समझ रहे थे, उसका निशाना तो हमारे पीछे था। उसकी निगाहें गोलियां कहीं और दाग रही थी और हम फिज़ूल में शहीद हुए जा रहे थे। तब जा के स्वयं बोध हुआ कि कोई भी जगह किसी भी वक़्त हो, हमारा चूतिया बनना तय ही है। तब का दिन था और आज का दिन है कि हमारी तरफ कोई देखती है तब मन यही कहता है, “बेचारी भैंगी होगी”।

 

Image credits:  http://tinyurl.com/h8rly8p

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