असर : सैराट

SPOILER ALERT: अगर “सैराट” नहीं देखी है तो आगे नहीं पढ़ें और जल्द से जल्द ये फिल्म देखें।

दरअसल ये बात जो कहने जा रहा हूँ वो उसी दिन से कहना चाह रहा था जिस दिन ये फिल्म देखी थी लेकिन टालते टालते इतने दिन हो गए। कल परसो एक खबर सुनी कि इसका हिंदी रीमेक करण जौहर करने वाले हैं तो घबरा के ये लिखने बैठ गया। इस से पहले कि इस फिल्म के नाम को नाश दे वो, इसकी आत्मा को लिख के रख लूँ।
बहरहाल, बात शुरू फिल्म के अंत से करते हैं। परश्या और आर्ची की हॉनर किलिंग कर दी गयी है और उन दोनों का नन्हा बच्चा अपने माँ बाप को बेजान पड़ा देख घबरा कर रोता हुआ भागता है। खून से सने उसके पैरों के निशान डरावने लगते हैं। ईमानदारी से कहूँ तो जब ये पहली बार देखा तो कोई असर नहीं हुआ। तब मुझे खुद की संवेदनशीलता पर भी शक़ हुआ। लेकिन भले ही मुझे चोट का अहसास तुरंत नहीं हुआ लेकिन चोट लगी थी और गहरी लगी थी। जब फिल्म के क्रेडिट्स रोल होने लगे तब दिमाग में तस्वीरें कौंधने लगी। उस अंतर्जातीय जोड़े की जिसकी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा अभी मैंने जिया था। उनकी बसाई उस छोटी दुनिया का जिसका मैं एक हिस्सा बना था और तब ये एहसास हुआ कि वो दुनिया तो अब नहीं रही। एक झटके में, एक पल में वो सब खतम हो गया। प्यार भरी वो आँखे अब मुर्दा है। उनके गलों से रिसता खून अब उनके दिल तक नहीं जा रहा और प्यार से जिन्दा हुए वो दिल अब खामोश हैं। जब ये एहसास हुआ कि कितना कुछ खो गया है तब आँखों से धुंधला दिखने लगा और पलक बंद करते ही एक मोटा आँसू हाथों पर गिरा।
फिर उसी रात जेहन में वो सारे अख़बार के अंदर के ब्लैक एंड वाइट पन्नों के कोनो में पड़ी वो ख़बरें भी आयी जिन्हें हर सुबह बस सरसरी निगाह से देख लेते थे। “प्रेमी का गला काटा”, “नवविवाहित जोड़ों की निर्मम हत्या”, “ऊँची जात में शादी करने की वजह से हत्या”… कितने परश्या और आर्ची मार दिए गए। कुछ अख़बारों के कोनों में दफ़न कितनी ही प्रेम कहानियाँ और हम बस उन पर सरसरी निगाह डाल बढ़ गए! हाँ कभी कभी हम ज़रूर रोये, जब मामला बड़े बड़े टीवी चैनलों पर आया हो या सत्यमेव जयते में आमिर खान ने बताया हो। लेकिन हमें रोना किस वजह से आया? किसी की दुनिया खत्म हो गयी इस वजह से कि उसकी दास्तां लिखने सुनाने वाले के हुनर की वजह से? ऐसा क्यों कि हम कभी अख़बार पढ़ के नहीं रोये?
हम अगर उस वजह से, जिससे रोज़ कितनों की ही दुनिया ख़त्म हो जाती है, डरते नहीं हैं, घृणा नहीं करते हैं तो हमें खुद से ये पूछना ज़रूरी है कि हम क्या हैं?

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