मसान: फिल्म से कहीं बढ़ कर

मसान, फिल्म दिल के जितने करीब है उतना करीब शायद ही और कोई फिल्म होगी। कितनी ही बार देख ली होगी ये फिल्म लेकिन हर बार शुरू से प्यार होता है इस से। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए ये एक फिल्म से कहीं बढ़ कर है। ये एक चोट है, उस दीवार पर जो एक तबके को बाकी चीजों से अलग कर के रखती है। शायद साधारणतः ये चीज़ कई लोगों को उतनी स्पष्ट नहीं दिखी हो या उतनी ज़रूरी न लगी हो लेकिन मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात थी और वो चीज़ ये थी कि इस बार इसकी एक कहानी का नायक अलग था।
आमतौर पर उत्तर भारत के परिवेश में बनी फिल्मों में नायक ऐसे नहीं होते हैं। आज तक तो बस यही लगा था कि प्यार बस शर्मा जी, मिश्रा जी और सिंह साहब के लड़कों को ही होता है। इस फिल्म ने बताया कि मुर्दे जलाने वाले डोम का बेटा दीपक भी प्यार में दीवाना होने का शौक रखता है। दीपक चौधरी, पॉलिटेक्निक में पढ़ने वाला, जिसका बाप उसे पढ़ लिख कर इस नरक से निकलने की सलाह देता है। और लोगों को विरासत में पुश्तैनी जमीन, घर, इतिहास मिलता है। वो वापस अपने अतीत में लौटना एन्जॉय करते हैं, you know, connecting with your roots वगैरह। दीपक जैसों के लिए ये सुविधा नहीं होती। उनका अतीत एक नरक होता है वो जिसे दूर पीछे छोड़ कर उड़ना चाहते हैं। विरासत में मिली नालियों और गन्दी गलियों को लात मार के खुद के पहचान से अलग फेंकना चाहते हैं।
वही दीपक जिसे अपने घर का पता बताने में शर्म आती है। वो जिसे हर वक़्त ये डर घेरे रहता है कि उसकी सच्चाई उसकी दोस्त के प्यार को घृणा में बदल देगी। वो दीपक जिसका दिल इस बात से बैठ जाता है कि जिससे उसे प्यार हुआ है वो लड़की अपर-कास्ट है। उसे अपनी लक्ष्मण रेखा दिखने लगती है। वो जाति, जिसे चुनने में उसका कोई हाथ नहीं था, वो उसके इश्क़ के रास्ते में आ रही है। तब उसे खुद की पहचान से नफरत होने लगती है। उसे धर्म की किताबों में लिखी वो बातें सच लगने लगती है जिसके मुताबिक ये पहचान ज़रूर उसके बुरे कर्मों का फल है। तब जब उसने अपने इश्क़ को अपने दिल में दफ्न करने की ठान ली होती है तब उसका प्यार बेड़ियों और दीवारों को तोड़ कर आता है और कहता है कि तुम्हारे साथ भागना पड़ा तो भाग जायेंगे। तरह तरह के कर्म काण्ड, वेद-शास्त्र, पंडों-क्षत्रियों ने सदियों से जो दीवार बनायी रखी वो एक नए प्यार कि चोट नहीं सह सकी। जिस दीपक चौधरी को ज़माने ने बताया और बार बार एहसास कराया उसके छोटेपन का उसे इस एक बात ने ज्ञान कराया उसके बराबर होने का।
ऐसे दीपक चौधरी कभी पहले 70 एमएम के परदे पर नहीं दिखे थे और शायद अब भी इतनी जल्दी ना दिखे लेकिन ये तो पता चल गया कि इनका भी अस्तित्व है। इश्क़ डोम के बेटे को भी होता है।

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