Movie Review: Mango Dreams

सफर दो किस्म के होते हैं, एक जिसमें दैहिक रूप से हम दूरी तय करते हैं और दूसरा जिसमे हम दिमाग़ी तौर पर आगे बढ़ते हैं। दोनों ही तरह के सफर में मंज़िल ज़रूर होती है। हो सकता है हमें पता न हो लेकिन मंजिल तो होती है। ऐसे ही एक सफर की कहानी है “मैंगो ड्रीम्स”। पंकज त्रिपाठी और वरिष्ठ अभिनेता रामगोपाल बजाज द्वारा अभिनीत ये एक अंग्रेजी भाषा की इंडिपेंडेंट फिल्म है जिसे अमेरिका के जॉन अपचर्च ने लिखा और निर्देशित किया है। पटना फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को अनुभव करने का मौका मिला।
अमित सिंह, एक रिटायर्ड डॉक्टर जो कि डिमेंशिया का मरीज़ है, वो सब कुछ भूल जाने से पहले अपनी यादों को फिर से जीना चाहता है। इस जद्दोजेहद में उसे साथ मिलता है एक ऑटो ड्राइवर सलीम का जिसके बेटे की ज़िन्दगी अमित ने बचायी थी। वो अपना क़र्ज़ उतारने के लिए अमित के सफर को पूरा करने की जिम्मेवारी उठाता है। इसी सफर की कहानी है “मैंगो ड्रीम्स”. कहानी यूँ तो एक बूढ़े आदमी के अपने जड़ों की तलाश के बारे में है लेकिन इसके साथ साथ एक और पहलु भी है इसका जिसमें देश की दो बड़ी दर्दनाक घटनाओं, partition के वक़्त के दंगों और गुजरात दंगों, की पीड़ा शामिल है।

पहले कहानी की बात करें तो जॉन का काम वाक़ई में बेहतरीन है। बिना राजनितिक बहसों में उलझे जिस संजीदगी और संवेदना से उन्होंने ऐसे विवादित मुद्दों को दिखाया है वो वाक़ई तारीफ़ के काबिल है और उनका एक विदेशी होते हुए ऐसी कहानी लिखना दिल को और भी छू जाता है। जितनी खूबसूरत ये कहानी है उतने ही खूबसूरत तरीके से उनके निर्देशन ने इसे परदे पर उतारा है। अहमदाबाद से ले कर देश के एक छोर तक के इस सफर को सीमित साधनों के बावजूद बेहतरीन ढंग से दिखाया गया है। फिल्म के दोनों मुख्य किरदारों के बीच होने वाले संवादों में कभी आपको दो पिता दिखेंगे, कभी दो पति और फिर दो इंसान। पहलु दर पहलु दो इंसानों के बीच के भेद को बख़ूबी मिटाया गया है। ये फिल्म आपको इंसानों और जमीन के टुकड़ों के बीच खींची गई लकीरों पर सवाल उठाने पर मजबूर करती है। मज़ाहिर रहीम और हमजा रहीम का स्क्रीनप्ले इस लिए काबिले तारीफ है।
ऐसी कहानी और निर्देशन को चार चाँद पंकज त्रिपाठी और रामगोपाल बजाज के अभिनय ने लगाया है। कई ऐसे सीन मिलेंगे जो आपको भीतर से झकझोर जायेंगे। एक 30-40 सेकंड्स का सीन ऐसा ही है जो शायद आपको यूट्यूब पर भी मिल जाये। वो सीन ऐसा है कि उसके गुजरने के बाद भी लंबे समय तक उसका असर रहता है। पंकज त्रिपाठी का चेहरा, उनके हाव भाव बिलकुल ही सम्मोहित करने वाले हैं। फिल्म के डायरेक्टर ने उनके बारे में कहा था कि उनका अभिनय हर भाषा बोलता है, इस दृश्य में पंकज ने उसे सही साबित कर दिया है। रामगोपाल बजाज को देखने का अवसर सिनेमा देखने वालों को ज़्यादा नहीं मिलता है और ये हमारा दुर्भाग्य है। इस फिल्म में हर उस फ्रेम में जिसमें वो हैं, नज़र बस उन पर ही टिकी रहती है। अभिनय की अनंत सीमा क्या है ये उनकी आँखों में दिखती है।
इस फिल्म पर तो बहुत लंबी बात की जा सकती है लेकिन आपके लिए इसका कोई मज़ा किरकिरा न करते हुए इतना ही कह सकता हूँ। अगर अवसर मिले तो ये फिल्म ज़रूर देखें। खासकर वो जो अपनी जड़ों से दूर हैं उन्हें ये फिल्म बेहद पसंद आएगी।

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