Review: काबिल देखूं या रईस

ये दोनों कहने को तो नयी फिल्म है मगर दोनों की कहानी वही पुरानी 80s के फिल्म्स की है। काबिल में है कि हीरोइन का रेप एक दबंग नेता का गुंडा भाई करता है, हीरोइन सुसाइड करती है और हीरो बदला लेता है। हमको तो लग रहा था कि परदे पर कहीं मिथुन दादा न आ जाएं।

मिथुन दा के दर्जनों फिल्मों की कहानी को रिब्रांड करने के लिए Daredevil वाला एलिमेंट जोड़ दिया है। अगर फुल देसी हैं और Daredevil नहीं देखी तो फिकर नॉट, आप “आँखें” (बच्चन वाली) और “जिगर” में बाबा ठाकुर की अजय देवगन को आँख पर पट्टी बांध के फाइट करने की ट्रेनिंग देने वाले सीन का भी रेफरेन्स ले सकते हैं।

अब नवाज़ुद्दीन को अपनी फिल्म में रख के फिल्म का AQ (acting quotient) बढ़ाने की कोशिश करने वाले शाहरुख़ खान के रईस की बात करते हैं। इस फिल्म को लिखने-बनाने वालों के दिमाग से एक बात हट गई कि ये फिल्म 80s में सेट है लेकिन इसका मतलब ये नहीं को late 70s और early 80s के फिल्मों के कहानी का ज़ेरॉक्स माल चला दें। हाँ इसमें भी रिब्रांडिंग की गयी है और उसके लिए इसमें ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई” को घुसेड़ दिया गया है।

काबिल में ग्रीक गॉड ने ओवर-एक्टिंग नहीं की है तो मेनस्ट्रीम सिनेमा के हिसाब से इसको अच्छी एक्टिंग बोला जा सकता है। अवार्ड शो वाला अवार्ड ज़रूर मिलेगा। यामी गौतम ने अपना बेस्ट दिया है यानि कि वो इसमें फिर से मर गयी है। कोरियाई फिल्मों के पायरेटेड डीवीडी की गुमटी(दुकान) लगाने वाले संजय गुप्ता ने ये फिल्म डायरेक्टली कॉपी नहीं की लेकिन कोशिश भरकस की है कि ये फिल्म उन फिल्मों जैसी दिखे। इसमें यामी और हृतिक के प्यार में पड़ने के पीछे की वजह उनका अँधा होना होता है। फिल्म में विलन को कतई हरामी दिखाया गया है। इतना ब्लैक एंड वाइट किरदार बनाये हैं कि अँधा भी पहचान जाये (quite literally)। ये है तो लार्जर दैन लाइफ कहानी लेकिन बनाने वालों ने कोशिश की है कि सच लगे। हालाँकि फेल हुए हैं लेकिन कोशिश की है।

रईस में फिर से गैंगस्टर और क्रिमिनल को फर्ज़ी रॉबिनहुड बता कर ग्लोरिफाय करने की बचकानी कोशिश की गयी है। फिल्म में दो तकिया कलाम हैं। एक है “मियाभाई की डेरिंग और बनिए का दिमाग”। कम्युनिटी बेस्ड स्टीरियोटाइप क्रिएट करने के अलावा इसका कोई मकसद नहीं है फिल्म में। इसके उलटा हीरो की हरकतें चूतियापे भरी होती है। रईस के बिज़नस सेन्स को देख के कैरक्टर के गुजराती होने पर शक होता है।

फिल्म में माहिरा खान सिर्फ गाने का सीक्वेंस शुरू करने के लिए और बिना प्रेग्नेंट दिखे प्रेग्नेंट होने के लिए है। अगर आप उसके डॉयलोग्स म्यूट कर दें तो फिल्म की कहानी पर कोई फर्क पड़ना नही है। नवाज़ुद्दीन भाई से निवेदन है कि अबी तीनों ख़ानों के साथ काम कर लिए, अब ऐसी फिल्में करना बंद करें, आपको अनुराग कश्यप का वास्ता। फिल्म के क्लाइमेक्स में एक ईमानदार IPS को विलन बना के 10-12 मर्डर और RDX स्मगल करने वाले को हीरो बनाने का ओछा प्रयास थूकनीय है।

कुल जमा बात ये कि अगर हृतिक या शाहरुख़ के फैन हैं तभी ये दोनों में से कोई फिल्म देखें वरना मिथुन या बच्चन की कोई पुरानी फिल्म उठा के देख लें।
साइड नोट: मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा द्वारा रीजनल लैंग्वेज में बोलने के तरीके का छीछालेदर करना जारी है। अपने बोलने के अंदाज से न तो रोनित रॉय महाराष्ट्रियन लगते हैं और न ही शाहरुख़ गुजराती

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