नींद के बाद

एक दुनिया है

पुर सुकूँ, महफूज़, ख़ूबसूरत

जो बसाई है मैंने नींद के पार

मेरे सिरहाने से एक मोड़ जाता है

वहीं से सीधे बढ़ जाना

जब लगे कि छूट चुका ग़म पीछे

और मुमकिन लगे दौड़ना, उड़ना और इश्क़

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उलझन

बेतरतीब, उलझे हुए धागे के जैसे होती हैं यादें

कभी कभी इसका एक सिरा आता है हाथ में

उम्मीद जगती है इसे सुलझा लेने की मगर

जैसे जैसे उस सिरे से आगे बढ़ते जाते हैं

उलझ जाती है उँगलियाँ भी धागे की उलझनों में

उलझते ही जाते हैं यादों के धागे और उन धागों में हम
……..

हुस्न

..और जब तुम मेरे कहने पे

कि तुम कितनी ख़ूबसूरत हो

मेरा ऐतबार नहीं करती तो मैं निराश होता हूँ

मैं सोचता हूँ

कि क्या तुम भी वो पैमाने मानती हो हुस्न के

जो कि छिछले और व्यर्थ हैं?

मैं तुम्हें जानता हूँ

हाथ से निकली लड़कियां

ज़माना तुम्हें देखता है

कुछ विस्मय, कुछ घृणा तो कुछ भय से

इसलिए कि तुम वो नहीं जो तुमसे आशा की गयी थी

जो तुम्हें ज़माना बनाना चाहता था

तुमने उस से बग़ावत की और बन गयी

वो जो तुम बनना चाहती थी।

दुष्यंत कुमार के नाम

वो ग़ज़ल ख़त्म हो गयी कब की

मैं अब कुछ नए शे’र सुनाता हूँ

तेरी साँसों की चढ़ती धुन को

अपनी धड़कन से मैं मिलाता हूँ

काजल से पुती काली रातों में

तेरी आँखों का नूर पाता हूँ
…….

चैन से मरने का इंतिज़ाम

हो गया चैन से मरने का इंतिज़ाम

इस तंग करने वाली ज़िन्दगी के

सुकूं भरे खात्मे का इंतिज़ाम

वो मोहब्बत जो हम करते रहे ता उम्र

वो मोहब्बत जो हमसे कतराती रही