दुष्यंत कुमार के नाम

वो ग़ज़ल ख़त्म हो गयी कब की

मैं अब कुछ नए शे’र सुनाता हूँ

तेरी साँसों की चढ़ती धुन को

अपनी धड़कन से मैं मिलाता हूँ

काजल से पुती काली रातों में

तेरी आँखों का नूर पाता हूँ
…….

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चैन से मरने का इंतिज़ाम

हो गया चैन से मरने का इंतिज़ाम

इस तंग करने वाली ज़िन्दगी के

सुकूं भरे खात्मे का इंतिज़ाम

वो मोहब्बत जो हम करते रहे ता उम्र

वो मोहब्बत जो हमसे कतराती रही

ले के रहेंगे

हाथ से छूने लायक न समझा

पैरों तले हमको कुचला, रौंदा

दबने की हद तक है दबाया,

अब पीछे हम तुम्हें धकेलेंगे

हम ले के रहेंगे

अपनी जगह हम ले के रहेंगे

हार जीत

एक तरफ के इश्क़ में 

हारा ही करते हैं लोग

सब छूट ही जाता है

सब खो ही जाता है आखिर में

लेकिन
…….

कमरा

एक कमरा है

वो कमरा जिसमें बंद है 

तुमसे जुड़ी हर बात

तुम्हारी वो बड़ी बड़ी आँखें

तुम्हारी लंबी खड़ी नाक

तीखी मुस्कान तुम्हारी

सारी बातें, बातों की यादें

साथ बीते लम्हें, कुछ आँसू कुछ हंसी

और इन सब के साथ

तुम्हारा और मेरा इश्क़ भी

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर

कहाँ हैं?

वो जिन्हें हिन्द पे नाज़ है

ये पूछती है कुछ आवाज़ें जो चुप नहीं होती

और जिन्हें कोई नहीं सुनता

वो औरतें जिनकी इस्मत महफूज़ नहीं है

जिन्हें लूटा, नोचा गया और फिर
……..