दंगा

जली हैं दुकानें, बिछी हैं लाशें
नरों के खुदा को बचाने
आज नरसंहार हुआ है;
मुबारक हो! शहर में आज दंगा हुआ है।

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हवा

तुम तूफां थी।
सागर को हिलकोरती,
पेड़ों को झंकझोरती,
कभी बादलों को उड़ाती
कभी दावानल भड़काती,
बहती फिरती थी
मदमस्त अल्हड़ सी
गुमाँ में चूर अपने ज़ोर के

दरख़्त

मैदान के आखिर में इक दरख़्त था
कुरेदा था जहाँ नाम
और लिखी थी इबारतें इश्क़ की;
न जाने कितनी दोपहरें गुज़री थी
उसके पीछे छुपते छुपाते सबसे,
इक ज़रिया था वो
ग़ुम हो के इस जहाँ से
अपने जहाँ में खो जाने का;

यादें

हर रात दिल में यादों का सैलाब सा आता है,
वो जो गुज़र चुके हैं उन लम्हों को फिर से जीने को दिल चाहता है।

याद है वो वक़्त जब शुरू हुआ था तेरा मेरा अफ़साना
तुझसे इक़रार पाने की जद्दोजहद मेरी
झूठा इनकार करने की वो शरारत तेरी